हाईकोर्ट ने शहरी विकास सचिव को राज्यभर के पार्कों, खेल मैदानों और खुले स्थानों की सूची तैयार कर कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में सार्वजनिक पार्कों, खेल मैदानों और खुले स्थानों के संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने शहरी विकास सचिव को नौ महीने के भीतर इन सार्वजनिक स्थानों की पहचान कर उनकी व्यापक सूची तैयार करने और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत अधिसूचित करने का निर्देश दिया है। इस आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शहरों और कस्बों में नागरिकों के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्थानों का रिकॉर्ड सरकारी स्तर पर स्पष्ट रहे और उनका संरक्षण किया जा सके। अदालत के निर्देश में उत्तर प्रदेश पार्क, खेल मैदान एवं खुले स्थान संरक्षण और विनियमन अधिनियम, 1975 का उल्लेख किया गया है, जो उत्तराखंड में भी लागू है। इस कानून के तहत सार्वजनिक पार्कों, खेल मैदानों और खुले स्थानों की पहचान और संरक्षण से संबंधित प्रक्रिया पूरी की जानी है। यह आदेश ऐसे समय आया है, जब तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण कई शहरों में खुले स्थानों पर दबाव बढ़ रहा है।
शहरों में पार्क और खेल मैदान केवल मनोरंजन के स्थान नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बच्चों को खेलने के लिए सुरक्षित जगह मिलती है, बुजुर्गों को सुबह-शाम टहलने का अवसर मिलता है और स्थानीय नागरिकों को खुले वातावरण में समय बिताने की सुविधा मिलती है। शहरी आबादी बढ़ने के साथ आवासीय और व्यावसायिक निर्माण का दबाव भी बढ़ता है। ऐसे में यदि सार्वजनिक भूमि का रिकॉर्ड स्पष्ट न हो तो अतिक्रमण, भूमि उपयोग में बदलाव और विवाद की आशंका बनी रहती है। अदालत का आदेश सरकार को इन स्थानों की पहचान और अधिसूचना की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की जिम्मेदारी देता है। राज्य के नगर निकायों और संबंधित विभागों को उपलब्ध रिकॉर्ड, भूमि की स्थिति और स्थानीय निकायों की जानकारी के आधार पर सूची तैयार करनी होगी। इसके लिए विभिन्न जिलों और शहरी क्षेत्रों के बीच समन्वय की जरूरत पड़ेगी।
इस प्रक्रिया में केवल सूची तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जरूरी होगा कि जिन स्थानों को सार्वजनिक पार्क या खेल मैदान के रूप में अधिसूचित किया जाए, उनकी सीमाएं स्पष्ट हों और उनका उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हो। नगर निकायों को यह सुनिश्चित करना होगा कि पार्कों में अनधिकृत निर्माण न हो और खेल मैदानों को दूसरे उपयोग में बदलने से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए। नागरिकों की भागीदारी भी इस काम को अधिक प्रभावी बना सकती है। स्थानीय निवासी अपने क्षेत्र के पार्कों, खेल मैदानों और खुले स्थानों की स्थिति से प्रशासन को अवगत करा सकते हैं। यदि किसी सार्वजनिक स्थान पर अतिक्रमण या अवैध निर्माण की शिकायत है तो उसका रिकॉर्ड तैयार कर संबंधित विभाग को भेजा जा सकता है। अदालत के आदेश के बाद अब सरकार के सामने नौ महीने की समयसीमा में प्रक्रिया पूरी करने की चुनौती होगी। इस फैसले का असर राज्य के शहरी नियोजन और सार्वजनिक सुविधाओं के संरक्षण पर पड़ सकता है।
